थका हुआ शरीर, थका हुआ मन
टूटे से स्वप्न, और ये बिखरा हुआ जीवन
कोलाहल भरी इस दुनिया में भी क्यों
निस्तब्धता में करता मेरा अस्तित्व विचरण ?
कब तक रहेंगी मेरी कल्पनाएँ निराकार
समय से करता हूँ यह प्रश्न मैं बार बार
समय हो जाता है निरुत्तर
इस चुप्पी का अर्थ मैं कर नहीं पाता स्वीकार
कुछ आशायें घनीभूत होकर न जाने कब से टँगी हैं
बरसने की प्रतीक्षा में
पर हाय! यह प्रतीक्षा उस क्षितिज की तरह अंतहीन क्यों है ?
हर बार एक हवा का झोँका आकर इन्हें उड़ा क्यों ले जाता है ?
-td, May'07.
Saturday, June 2, 2007
Friday, April 13, 2007
अक्सर
काँच की इस दीवार के उस पार
मैं अक्सर देखा करता हूँ...
कुछ टुकड़े बादल के...
और कुछ झूमते,
लहराते पत्ते नज़र आते हैं
ठीक तुम्हारी हँसी की तरह...
मेरी उपस्थिति से अनभिज्ञ..
इन्हें क्या पता कि मेरी आँखें
इनकी गति को निहार
तुम्हारी अनुभूति कर लेती हैं...
और मेरे जीवित होने का
एक सजीव एहसास मुझे दे जाती हैं...
मैं अक्सर देखा करता हूँ...
कुछ टुकड़े बादल के...
और कुछ झूमते,
लहराते पत्ते नज़र आते हैं
ठीक तुम्हारी हँसी की तरह...
मेरी उपस्थिति से अनभिज्ञ..
इन्हें क्या पता कि मेरी आँखें
इनकी गति को निहार
तुम्हारी अनुभूति कर लेती हैं...
और मेरे जीवित होने का
एक सजीव एहसास मुझे दे जाती हैं...
Thursday, March 8, 2007
क्यों?
कुछ अधूरे ख्वाब, कुछ अनकही बातें
समय की परिधि से परे कुछ अंतहीन क्षण
क्यों मुझे आज पुकार रहे हैं?
एक निःशब्द निमंत्रण, एक अतुल्य आकर्षण
ह्र्दय में बसी किसी की मधुर छवि
क्यों मुझे आज दुर्बल कर रही है?
कुछ नूतन स्मृति चिह्न, कुछ धूमिल दृश्य
किसी की उपस्थिति का अकारण आभास
क्यों मुझे आज व्याकुल कर रहा है?
मन आज नियंत्रण से बाहर क्यों?
जब मंज़िलें और भी हैं, फिर
मेरे सम्मुख वही एकमात्र लक्ष्य क्यों?
समय की परिधि से परे कुछ अंतहीन क्षण
क्यों मुझे आज पुकार रहे हैं?
एक निःशब्द निमंत्रण, एक अतुल्य आकर्षण
ह्र्दय में बसी किसी की मधुर छवि
क्यों मुझे आज दुर्बल कर रही है?
कुछ नूतन स्मृति चिह्न, कुछ धूमिल दृश्य
किसी की उपस्थिति का अकारण आभास
क्यों मुझे आज व्याकुल कर रहा है?
मन आज नियंत्रण से बाहर क्यों?
जब मंज़िलें और भी हैं, फिर
मेरे सम्मुख वही एकमात्र लक्ष्य क्यों?
Friday, February 23, 2007
चलते चलो
न होगा अब कभी म्लान मुख
मिट जायेंगे तेरे सारे दुख
पथ को ही बना लो पाथेय तुम
चलते चलो,
सफलता अवश्य लेगी तुम्हारे कदम चूम
राहें सूनी हैं तो क्या
मंज़िल दूर है तो क्या
खुद का साथ तू कभी न छोड़ना
मुश्किलें चाहें लाखों आयें,
कभी उनसे मुँह न मोड़ना
माना ज़िंदगी है बड़ी ग़मगीन अभी
कोई भी दिया रौशन नहीं
पर उम्मीदों को सदा ज़िंदा रखना
अपने अंदर जो आग है
उसे कभी बुझने न देना
मिट जायेंगे तेरे सारे दुख
पथ को ही बना लो पाथेय तुम
चलते चलो,
सफलता अवश्य लेगी तुम्हारे कदम चूम
राहें सूनी हैं तो क्या
मंज़िल दूर है तो क्या
खुद का साथ तू कभी न छोड़ना
मुश्किलें चाहें लाखों आयें,
कभी उनसे मुँह न मोड़ना
माना ज़िंदगी है बड़ी ग़मगीन अभी
कोई भी दिया रौशन नहीं
पर उम्मीदों को सदा ज़िंदा रखना
अपने अंदर जो आग है
उसे कभी बुझने न देना
Wednesday, February 21, 2007
इंतज़ार
ज़िंदगी मे बस इंतज़ार ही किया हमने
वो न आई मगर, देखी कितनी राहें हमने
दर-बदर भटकता रहा, जिसकी तलाश में...
मिलके भी न मिली वो...किस्मत ऐसी क्यों मिली हमें ?
वो न आई मगर, देखी कितनी राहें हमने
दर-बदर भटकता रहा, जिसकी तलाश में...
मिलके भी न मिली वो...किस्मत ऐसी क्यों मिली हमें ?
Friday, January 19, 2007
अचेतन मन
क्यों करता है मेरा अचेतन मन
अब भी केवल उसका ही चिन्तन?
स्वप्नों मे क्यों उसकी ही प्रतीक्षा प्रतिपल?
उसकी स्मृति क्यों हो गयी है अमिट?
अभी भी शायद कुछ आशायें हैं जीवित
जो करने नहीं देतीं पराजय स्वीकार
इधर अनिश्चित भविष्य दे रहा है पुकार
क्या कभी होंगे मेरे सपने साकार?
अब भी केवल उसका ही चिन्तन?
स्वप्नों मे क्यों उसकी ही प्रतीक्षा प्रतिपल?
उसकी स्मृति क्यों हो गयी है अमिट?
अभी भी शायद कुछ आशायें हैं जीवित
जो करने नहीं देतीं पराजय स्वीकार
इधर अनिश्चित भविष्य दे रहा है पुकार
क्या कभी होंगे मेरे सपने साकार?
Thursday, January 4, 2007
मुस्कुराहट
कभी कभी मैं मुस्कुरा देता हूँ
बस यूँ ही
कभी खुद पर तो कभी
किसी की मुस्कुराहटों को याद कर
अपनी किस्मत पर
कभी कभी मैं भी मुस्कुरा देता हूँ।
बस यूँ ही
कभी खुद पर तो कभी
किसी की मुस्कुराहटों को याद कर
अपनी किस्मत पर
कभी कभी मैं भी मुस्कुरा देता हूँ।
Tuesday, January 2, 2007
Tuesday, December 26, 2006
रणभूमि !
बड़े दिनों बाद, मुझे फिर कुछ हो गया
कल मैं फिर कुद पड़ा रणभूमि में
इस जर्जर शरीर को लेकर
बिन साथी, बिन सारथी,
साथ था तो बस एक व्यथित ह्र्दय ।
करना था तारण
किसी और का नहीं
पीड़ित था मैं स्वयं
सो पुन: किया अस्त्र धारण ।
युद्ध हुआ सदा की तरह घमासान
कई बार लगा कि चले गये प्राण
चला सतत संघर्ष,चले अगणित बाण
थे दाव पर कितने जीवन,मान-सम्मान।
ढल रहा था अब सूर्य,
पश्चिम भी हो रहा था रक्ताक्त
नहीं था मेरे पास इच्छामृत्यु का वरदान
फिर भी अटूट था मेरा अभिमान ।
अन्तत: हुआ अन्त इस युद्ध का
परिणामहीन एक और भीषण द्वंद का
आज मैं फिर खड़ा हूँ यहाँ, प्रतीक्षा है
एक नये ललकार,एक नये सुअवसर का ।
- तापस
कल मैं फिर कुद पड़ा रणभूमि में
इस जर्जर शरीर को लेकर
बिन साथी, बिन सारथी,
साथ था तो बस एक व्यथित ह्र्दय ।
करना था तारण
किसी और का नहीं
पीड़ित था मैं स्वयं
सो पुन: किया अस्त्र धारण ।
युद्ध हुआ सदा की तरह घमासान
कई बार लगा कि चले गये प्राण
चला सतत संघर्ष,चले अगणित बाण
थे दाव पर कितने जीवन,मान-सम्मान।
ढल रहा था अब सूर्य,
पश्चिम भी हो रहा था रक्ताक्त
नहीं था मेरे पास इच्छामृत्यु का वरदान
फिर भी अटूट था मेरा अभिमान ।
अन्तत: हुआ अन्त इस युद्ध का
परिणामहीन एक और भीषण द्वंद का
आज मैं फिर खड़ा हूँ यहाँ, प्रतीक्षा है
एक नये ललकार,एक नये सुअवसर का ।
- तापस
Wednesday, December 13, 2006
समय
समय से कुछ उम्मीदें हमें भी थीं
जीवन पथ पर कुछ मंज़िलों की चाह हमें भी थीं
राहें हमने स्वयं चुनी थी....कारवाँ भी था तैयार
पर अब न वो रास्ते शेष हैं, न मंज़िलों का अम्बार
सामने दीखता है बस एक अपार पारावार
- तापस
जीवन पथ पर कुछ मंज़िलों की चाह हमें भी थीं
राहें हमने स्वयं चुनी थी....कारवाँ भी था तैयार
पर अब न वो रास्ते शेष हैं, न मंज़िलों का अम्बार
सामने दीखता है बस एक अपार पारावार
- तापस
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